भानु दसम्म, जनम्म निसापति, मंगल - बुद्ध सिवस्थल लीके।
जो गुरु होंय धरम्म भवन्न के तौ भृगुनंद सुमंद नवीके॥ [1]
तीसरो केतु समेत बिधुग्रस तौ हरिवंश मन-क्रम फीके।
गोविन्द छाँड़ि भ्रमंत दसों दिस तौ करिहैं का नवग्रह नीके॥ [2]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (2)
भूमिकाः
इस सवैये में सम्पूर्ण शुभ माने जाने वाले ग्रहों का उल्लेख करके भक्ति शून्य व्यक्ति के लिए उनकी व्यर्थता प्रतिपादित की गई है।
व्याख्याः
दसवें सूर्य, जन्म के चन्द्रमा, मंगल और बुद्ध ग्यारहवें, नवम वृहस्पति और शुक्र नवम अच्छे स्थान में अर्थात् तीसरे-छटवें, ग्यारहवें शनि तथा राहु और केतु तीसरे स्थान में कुंडली में पड़े हों तो भी जो व्यक्ति गोविन्द को छोड़ के दसों दिशाओं में भ्रमता डोलता है, उसकी उत्तम ग्रह कुछ भी भलाई नहीं कर सकते।
जो गुरु होंय धरम्म भवन्न के तौ भृगुनंद सुमंद नवीके॥ [1]
तीसरो केतु समेत बिधुग्रस तौ हरिवंश मन-क्रम फीके।
गोविन्द छाँड़ि भ्रमंत दसों दिस तौ करिहैं का नवग्रह नीके॥ [2]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (2)
भूमिकाः
इस सवैये में सम्पूर्ण शुभ माने जाने वाले ग्रहों का उल्लेख करके भक्ति शून्य व्यक्ति के लिए उनकी व्यर्थता प्रतिपादित की गई है।
व्याख्याः
दसवें सूर्य, जन्म के चन्द्रमा, मंगल और बुद्ध ग्यारहवें, नवम वृहस्पति और शुक्र नवम अच्छे स्थान में अर्थात् तीसरे-छटवें, ग्यारहवें शनि तथा राहु और केतु तीसरे स्थान में कुंडली में पड़े हों तो भी जो व्यक्ति गोविन्द को छोड़ के दसों दिशाओं में भ्रमता डोलता है, उसकी उत्तम ग्रह कुछ भी भलाई नहीं कर सकते।

