मेरे गति ब्रजपति कैं ब्रजवासी - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (145)

मेरे गति ब्रजपति कैं ब्रजवासी - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (145)

मेरे गति ब्रजपति कैं ब्रजवासी।
जिनकें प्रान जीवनि धन राधा वृन्दाविपिन विलासी। [1]
सँग सहचरी श्रीहरिदासी मोहि सहायक उभैं उपासी॥
श्रीबिहारीदास निरभै भजि हरि पद तजि लोक वेद की हांसी॥ [2]

- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (145)

ब्रजवासी जन ही मेरे जीवन के एकमात्र शरण्य हैं, जो श्री राधा कृष्ण के निजी जन हैं। उनकी प्राण जीवन धन श्री राधा हैं, जो सदैव श्री वृंदावन में विलास परायण हैं। [1]

श्री हरिदासी सहचरी जो नित्य श्री जुगल किशोर के निकट रहती हैं, मेरी सहायक हैं और साथ ही श्री राधा कृष्ण की इस अनन्य भक्ति को प्रदान करने वाली मेरी आध्यात्मिक गुरु भी हैं। श्री बिहारिन देव कहते हैं कि ब्रजवासियों और श्री हरिदासी सहचरी की कृपा से, वे समाज और वेदों की बेड़ियों को तोड़ श्री राधा कृष्ण के चरण कमलों की सेवा करते हैं। [2]