कजर बिन कारी तेरी अखियाँ - श्री कल्याण दास

कजर बिन कारी तेरी अखियाँ - श्री कल्याण दास

(राग नायकी)
कजर बिन कारी तेरी अखियाँ॥ [1]
फुलेल बिन चिकुर चिकने अधर राते बिन पान।
मंजन बिन जोत दसन आछै आभूषण बिन कैसी नीकी लागे तू सुजान॥ [2]
बिन सुगन्ध तो तन सुगन्धमय कोक, कला पढ़े बिन रति की खान।
प्रभु कल्याण गिरधरन लाल के तू ही जीवन प्राण॥ [3]

- श्री कल्याण दास

हे श्री राधा, आपकी आंखें बिना काजल के ही काली हैं। [1]
आप बिना किसी उबटन के ही अति सुकुमारी हैं और पान के बिना ही आपके होंठ लाल हैं। आपकी दन्त पंक्तियाँ बिना मंजन के ही श्वेत हैं और आपकी छवि बिना किसी आभूषण के ही बहुत आकर्षित है। [2]
बिना किसी इत्र के ही आपके अंग से दिव्य सुगंध प्रवाहित हो रहा है और आप शास्त्र अध्ययन किए बिना ही प्रेम की सभी कलाओं की स्वामिनी हैं। श्री कल्याणदास कहते हैं, "हे श्री राधा, आप मेरे प्यारे गिरधर लाल की जीवन प्राण हैं।" [3]