झूलत डोल श्रीकुंजबिहारी - श्री स्वामी हरिदास जी, केलिमाल (108)

झूलत डोल श्रीकुंजबिहारी - श्री स्वामी हरिदास जी, केलिमाल (108)

(राग गौरी)
झूलत डोल श्रीकुंजबिहारी।
दूसरी ओर रसिक राधावर नागरि नवल दुलारी।। [1]
राखे न रहत हँसत कहि कहि प्रिया
बिलबिलात पिय भारी। [2]
श्रीहरिदास के स्वामी स्याम कहत री प्यारी
अबकैं राखि हा हा री॥ [3]

- श्री स्वामी हरिदास जी, केलिमाल (108)

सखी सखी से कह रही है- अति आनंद से भर पुष्यों के निकुंज में पिय प्यारी दोनों (डोल) झूला झूल रहे हैं। एक ओर कुंज बिहारी हैं तो दूसरी ओर रसिकों की स्वामिनी श्री राधा नवल दुलारी हैं। [1]
वे जोर से झोटा दे झूल रही हैं। श्रीजी अपने स्वभाव के अनुसार ही चलती हैं। अलबेली सरकार जो चाहती हैं वही करती हैं। कुंज बिहारी प्रिया जी को बिलबिलाहट से कह रहे हैं- अब मत झूलो । हे प्यारी जी! आप और मत झूलिए। प्यारीजी जीतीं पिय हारे, हँस-हँस कर आप प्रसन्नता में भर झूल रही हैं। [2]
मन ही मन पिय की चाहना बहुत है। अतः प्रबलता से झूल रही हैं। श्री हरिदासी जी की स्वामी श्याम, श्यामा जी से कह रहे हैं- हे प्यारी अबकी बार मुझे अंक में रखो। मैं आप की हा हा खाता हूँ, शरण में रहना चाहता हूँ, थमो, आपके अंग रूपी डोल झूले में झूलना चाहता हूँ। [3]