मुख सों मुख मिलाय देखत आरसी - श्री गोविन्द स्वामी, श्री गोविन्द स्वामी जी की वाणी (405)

मुख सों मुख मिलाय देखत आरसी - श्री गोविन्द स्वामी, श्री गोविन्द स्वामी जी की वाणी (405)

(राग विलावल)
मुख सों मुख मिलाय देखत आरसी।
विकसित नील कमल ढिग उदित भयौ कैधौं शशी॥ [1]
निरख वदन मुसकाय परसपर करत बिहँसि गिरिजात अंक हँसी।
गोविन्द प्रभु प्यारी जू परस्पर देखियत परे प्रेम बसी ॥ [2]

- श्री गोविन्द स्वामी, श्री गोविन्द स्वामी जी की वाणी (405)

श्री श्यामाश्याम अपने श्री मुख को मुख से मिला कर आईने में अपनी छवि देख रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है जैसे पूर्णिमा का चंद्र एक पूर्ण विकसित नीले कमल के साथ उत्पन्न हो गया है। [1]
जब वे एक-दूसरे को देखते हैं तो वे दोनों मुस्कुराने लगते हैं, और इस केलि लीला के आनंद में मग्न दोनों हसने से एक दूसरे के अंक में गिर जाते हैं !!! श्री गोविंददास कह रहे हैं "मेरे प्यारे जू एवं श्री प्यारी जू नित्य दम्पति हैं तथा दोनों परस्पर एक दूसरे के प्रेम आकर्षण हैं, एवं एक दूसरे के प्रेम में बंधे हैं। [2]