(राग भैरवी)
प्यारी जू कौन तिहारी खोट ।
मोसों बनी न कछु वै स्वामिनी हौं औगुन की मोट ।। [1]
श्रीवन दरस दिखायके राधे मेटो जियकी चोट ।
ललितकिशोरी कौ अपनावहु गही तिहारी ओट ।। [2]
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (68)
हे प्यारी जू आपकी कृपा में लेश मात्र कोई भी कमी नहीं है, हे स्वामिनी, सारी कमी मेरे भीतर है मैं कुछ भी करने में असमर्थ हूँ एवं मैं ही अवगुण की खान हूँ । [1]
हे प्रिया जू, यूँ तो मैं अवगुणों की खान हूँ, परंतु मेरी आशा एक मात्र आपसे ही है एवं आपकी ही शरण आया हूँ मैं, एवं आप कैसे भी मुझे अपनाओ और मेरे हृदय की पीड़ा को दूर कर श्रीधाम वृंदावन के दर्शन करवा मेरे हृदय में वृंदावन के अद्बुत रस का संचार करो । [2]
प्यारी जू कौन तिहारी खोट ।
मोसों बनी न कछु वै स्वामिनी हौं औगुन की मोट ।। [1]
श्रीवन दरस दिखायके राधे मेटो जियकी चोट ।
ललितकिशोरी कौ अपनावहु गही तिहारी ओट ।। [2]
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (68)
हे प्यारी जू आपकी कृपा में लेश मात्र कोई भी कमी नहीं है, हे स्वामिनी, सारी कमी मेरे भीतर है मैं कुछ भी करने में असमर्थ हूँ एवं मैं ही अवगुण की खान हूँ । [1]
हे प्रिया जू, यूँ तो मैं अवगुणों की खान हूँ, परंतु मेरी आशा एक मात्र आपसे ही है एवं आपकी ही शरण आया हूँ मैं, एवं आप कैसे भी मुझे अपनाओ और मेरे हृदय की पीड़ा को दूर कर श्रीधाम वृंदावन के दर्शन करवा मेरे हृदय में वृंदावन के अद्बुत रस का संचार करो । [2]

