कोऊ धन धाम, चाहे अबिराम कोऊ,
साहिबी सुरेस भाँति लाख लहियतु है। [1]
कोऊ गजराज, महाराज, सुखराज कोऊ,
तीरथ बरत नेम अंग दहियतु है॥ [2]
ऐसो चित चाहे, चरचा है दुनिया की हठी,
चाहै हृदै एक तौन ठीक ठहियतु है। [3]
जन रखवारी की सु प्रभु प्रानप्यारी की,
सुकीरति-दुलारी की नज़र चहियतु है॥ [4]
- श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (7)
श्री हठी जी कहते हैं, "कुछ लोग धन की प्राप्ति की लालसा रखते हैं, कुछ राज्य के सुख की इच्छा करते हैं, कुछ प्रतिष्ठा पाने के इच्छुक होते हैं, और कुछ लाखों बार इन्द्र के समान वैभव प्राप्त करने के बाद भी अपनी इच्छाओं का दमन नहीं कर पाते।" [1]
साहिबी सुरेस भाँति लाख लहियतु है। [1]
कोऊ गजराज, महाराज, सुखराज कोऊ,
तीरथ बरत नेम अंग दहियतु है॥ [2]
ऐसो चित चाहे, चरचा है दुनिया की हठी,
चाहै हृदै एक तौन ठीक ठहियतु है। [3]
जन रखवारी की सु प्रभु प्रानप्यारी की,
सुकीरति-दुलारी की नज़र चहियतु है॥ [4]
- श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (7)
श्री हठी जी कहते हैं, "कुछ लोग धन की प्राप्ति की लालसा रखते हैं, कुछ राज्य के सुख की इच्छा करते हैं, कुछ प्रतिष्ठा पाने के इच्छुक होते हैं, और कुछ लाखों बार इन्द्र के समान वैभव प्राप्त करने के बाद भी अपनी इच्छाओं का दमन नहीं कर पाते।" [1]
कई लोग राजा-महाराजा बनने की इच्छा में विभिन्न तीर्थों की यात्रा करते हैं, व्रत और नियमों का पालन करते हुए कठोर साधनाएँ करके अपने शरीर को तपाते हैं। [2]
किन्तु चित्त ऐसा होना चाहिए कि संसार के सभी सुख-दुःख और चर्चाओं से हटकर, केवल श्री राधारानी पर एकनिष्ठ होकर ध्यान केंद्रित किया जाए। [3]
किन्तु चित्त ऐसा होना चाहिए कि संसार के सभी सुख-दुःख और चर्चाओं से हटकर, केवल श्री राधारानी पर एकनिष्ठ होकर ध्यान केंद्रित किया जाए। [3]
श्री हठी जी कहते हैं, "मेरे हृदय की एकमात्र अभिलाषा यही है कि अनंत कोटि ब्रह्मांडों के जीवों की रक्षा करने वाली, श्री श्यामसुंदर की प्राण प्यारी, कीर्ति-दुलारी श्री राधा की कृपा दृष्टि ही मुझे प्राप्त हो।" [4]

