यह ऋतु रूसवे की नाहीं - श्री सूरदास

यह ऋतु रूसवे की नाहीं - श्री सूरदास

(राग मल्हार)
यह ऋतु रूसवे की नाहीं ।
बरसत मेह नेह धरणी के बोलत कुँवर कन्हाई ।।[1]
जोवेली ग्रीष्म ऋतु दाधी ते तरुवर लपटाई ।
देखो नदी प्रेम रसमाती मिलन समुद्रे धाईं ।। [2]
यह समयो है दिवस चार के समझ चतुर मन माहीं ।
सूरदास उठ चली श्रीराधा दै प्रीतम गलबाँही ।। [3]

- श्री सूरदास

श्रीकृष्ण श्री राधिका से कहते हैं, "यह रूठने का मौसम नहीं है!" देखो, कैसे मेघ पृथ्वी के लिए अपने प्रेम की वर्षा कर रहा है। [1]
 वन की लता, जलती हुई गर्मी से मुक्त, अब अपने निकटतम वृक्ष से लिपट रही है! देखो, समुद्र के लिए प्रेम से भरी नदियाँ, समुद्र से मिलने के लिए कितनी जल्दी बहती हैं। [2]
 हे चतुर शिरोमणि श्री राधे, कृपया मेरी मन की बात को समझें!! समय बहुत कम है !!  श्री सूरदास कहते हैं, "यह सुनकर श्री राधिका उठ जाती हैं और अपने प्रिय श्री श्यामसुन्दर को ह्रदय से लगाने के लिए दौड़ पड़ती हैं।" [3]