जय राधे जय कृष्ण जय वृंदावन,
रसिक मुकुट मणि जय गोपीजन ।
राधे राधे रटें श्याम, राधे रटे श्याम श्याम,
राधे श्याम युगल नाम, मेरो है जीवन ।। [1]
हौं भई सहचरि राधेरानी की,
नित्यधाम वृंदावन महारानी की ।
नित्यसेवा नित्यधाम, नित्य पावूँ आठों याम,
राखो रूचि सोइ जोइ, ठकुरानी की ।। [2]
मेरो एक प्राणधन, एक ही जीवन,
नंदनंदन मदन मोहन, राधिका रमन ।
श्याम ही है मेरो यार, श्याम ही सों मेरो प्यार,
श्याम ही समायो है ' कृपालु ' तन मन ।। [3]
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, ब्रज रस माधुरी (1.91)
श्री राधा की जय, श्रीकृष्ण की जय, वृंदावन की जय, और तत सुख सुखिया गोपियों की जय। श्याम [श्री कृष्ण] "राधे राधे" का जाप करते हैं और राधे "श्याम श्याम" का जाप करतीं हैं, लेकिन युगल नाम "राधे श्याम" ही मेरा जीवन है। [1]
मैं श्री राधारानी की 'सहचारी' बन गयी हूँ, जो नित्य दिव्य श्री वृंदावन धाम की महारानी हैं। अब उनकी सहचरी बनकर मैं श्री ठकुरानी [राधारानी] की निःस्वार्थ और अनन्य सेवा दिन-रात, उनकी इच्छा के अनुसार, नित्य धाम वृंदावन में कर रहा हूँ। [2]
श्री कृपालु जी महाराज कहते हैं "मेरे प्राणधन, मेरे जीवन का सार कोई और नहीं बल्कि श्री राधिका के प्रिय श्री कृष्ण हैं। श्री कृष्ण मेरे मित्र हैं, श्री कृष्ण मेरे प्रिय हैं, मेरे तन, मन और आत्मा के हर रोम छिद्र में केवल श्री कृष्ण ही समाये हुए हैं।" [3]
रसिक मुकुट मणि जय गोपीजन ।
राधे राधे रटें श्याम, राधे रटे श्याम श्याम,
राधे श्याम युगल नाम, मेरो है जीवन ।। [1]
हौं भई सहचरि राधेरानी की,
नित्यधाम वृंदावन महारानी की ।
नित्यसेवा नित्यधाम, नित्य पावूँ आठों याम,
राखो रूचि सोइ जोइ, ठकुरानी की ।। [2]
मेरो एक प्राणधन, एक ही जीवन,
नंदनंदन मदन मोहन, राधिका रमन ।
श्याम ही है मेरो यार, श्याम ही सों मेरो प्यार,
श्याम ही समायो है ' कृपालु ' तन मन ।। [3]
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, ब्रज रस माधुरी (1.91)
श्री राधा की जय, श्रीकृष्ण की जय, वृंदावन की जय, और तत सुख सुखिया गोपियों की जय। श्याम [श्री कृष्ण] "राधे राधे" का जाप करते हैं और राधे "श्याम श्याम" का जाप करतीं हैं, लेकिन युगल नाम "राधे श्याम" ही मेरा जीवन है। [1]
मैं श्री राधारानी की 'सहचारी' बन गयी हूँ, जो नित्य दिव्य श्री वृंदावन धाम की महारानी हैं। अब उनकी सहचरी बनकर मैं श्री ठकुरानी [राधारानी] की निःस्वार्थ और अनन्य सेवा दिन-रात, उनकी इच्छा के अनुसार, नित्य धाम वृंदावन में कर रहा हूँ। [2]
श्री कृपालु जी महाराज कहते हैं "मेरे प्राणधन, मेरे जीवन का सार कोई और नहीं बल्कि श्री राधिका के प्रिय श्री कृष्ण हैं। श्री कृष्ण मेरे मित्र हैं, श्री कृष्ण मेरे प्रिय हैं, मेरे तन, मन और आत्मा के हर रोम छिद्र में केवल श्री कृष्ण ही समाये हुए हैं।" [3]

