अधम उधारण पद रज प्यारी ।
त्यौ पद कंज चंद नख तैसे , त्यौ नख चन्द छटा री ।। [1]
मृदु मुसिकान मनोहर चितवन , अंग-अंग दुति न्यारी ।
कोटि पतित पल पार लगावत , राधा नाम सदा री ।। [2]
जेते पतित उधारण सिर पर, गिनत-गिनत हठ हारी ।
'भोरी' जो अब भव निधि डूबै, तौ इक अचरज भारी ।। [3]
- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (55)
हे मेरी प्यारी श्री राधे ! आपके चरणों की रज , घोर पापियों के जघन्य पापो का विनाश करने वाली है । जिस प्रकार आपके श्री चरण, कमल जैसे कोमल है, उसी प्रकार चरणों के नख, चन्द्रमा के समान शीतलता लिए हुए है, तथा ठीक उसी प्रकार नखो की आभा , चाँदनी की तरह शोभायमान है । [1]
आपकी मुस्कान में मधुरता है, आपकी दृष्टि मन को चुरा लेने वाली है तथा आपके प्रत्येक अंग की कान्ति अति अद्भुत है । आपके 'राधा' नाम का स्मरण करने पर, एक क्षण में ही, करोड़ो पतितो का बेड़ा पार हो जाता है । [2]
मेरे ध्यान में, न जाने कितने पतितो के उद्धार करने की बात आ रही है, मैं तो उन्हें गिनते-गिनते थक-हार चुकी हूँ । श्रीहित भोरी सखी जी कहती है कि इतने पतितो के उद्धार की गाथा सुनकर भी, यदि मैं भव-सागर में डूबी रहती हूँ, तो अत्यंत आश्चर्य ही होगा । [3]
त्यौ पद कंज चंद नख तैसे , त्यौ नख चन्द छटा री ।। [1]
मृदु मुसिकान मनोहर चितवन , अंग-अंग दुति न्यारी ।
कोटि पतित पल पार लगावत , राधा नाम सदा री ।। [2]
जेते पतित उधारण सिर पर, गिनत-गिनत हठ हारी ।
'भोरी' जो अब भव निधि डूबै, तौ इक अचरज भारी ।। [3]
- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (55)
हे मेरी प्यारी श्री राधे ! आपके चरणों की रज , घोर पापियों के जघन्य पापो का विनाश करने वाली है । जिस प्रकार आपके श्री चरण, कमल जैसे कोमल है, उसी प्रकार चरणों के नख, चन्द्रमा के समान शीतलता लिए हुए है, तथा ठीक उसी प्रकार नखो की आभा , चाँदनी की तरह शोभायमान है । [1]
आपकी मुस्कान में मधुरता है, आपकी दृष्टि मन को चुरा लेने वाली है तथा आपके प्रत्येक अंग की कान्ति अति अद्भुत है । आपके 'राधा' नाम का स्मरण करने पर, एक क्षण में ही, करोड़ो पतितो का बेड़ा पार हो जाता है । [2]
मेरे ध्यान में, न जाने कितने पतितो के उद्धार करने की बात आ रही है, मैं तो उन्हें गिनते-गिनते थक-हार चुकी हूँ । श्रीहित भोरी सखी जी कहती है कि इतने पतितो के उद्धार की गाथा सुनकर भी, यदि मैं भव-सागर में डूबी रहती हूँ, तो अत्यंत आश्चर्य ही होगा । [3]

