ब्रह्म नहीं माया नहीं - ब्रज के दोहे

ब्रह्म नहीं माया नहीं - ब्रज के दोहे

ब्रह्म नहीं माया नहीं, नहीं जीव नहिं काल।
अपनी हू सुधि ना रही, रह्यौ एक नंदलाल॥

- ब्रज के दोहे

न मैं ब्रह्म के रहस्य को जानना चाहता हूँ, न माया के विषय में, न ही जीव के स्वरूप को समझना चाहता हूँ और न ही काल के रहस्य को। मेरी तो बस यही कामना है कि मैं अपनी सुध-बुध खो दूँ और मेरे चित्त में सदा केवल श्री राधा-कृष्ण का ही ध्यान बना रहे।