(कवित्त)
बड़े बड़े मुनी ज्ञानी वास हेत ललचानी मती,
वेदहू नें नेत नेत कह गायौ है। [1]
मोहन के प्यारे भारे ध्यान धर धर हारे,
तिनहूँ कौ याकौ ना प्रभाव दरसायौ है॥ [2]
'लाल बलबीर' राजधानी श्रीकिशोरी जू की,
चौधेहू भुवन में अखण्ड तेज छायौ है। [3]
राधिका की दासी सुखरासी जौलों होय नहीं,
तौलो बनराज जू कौ कौने रस पायो है॥ [4]
- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री वृंदावन शतक (25)
बड़े-बड़े मुनि और ज्ञानी भी वृंदावन में वास करने के लिए लालायित रहते हैं। यह वही धाम है, जिसे वेदों ने "नेति-नेति" कहकर गाया है, अर्थात जिसकी महिमा का वर्णन वे भी पूर्ण रूप से नहीं कर पाए। [1]
श्री कृष्ण के नित्य सिद्ध भक्तों के लिए भी इस निकुंज वृंदावन का साक्षात्कार दुर्लभ है। यहां का दिव्य प्रभाव ऐसा है कि वे भी इसे संपूर्णता में नहीं देख पाए हैं और इस अनूठे रस से अपरिचित ही रहे हैं। [2]
श्री लाल बलबीर जी कहते हैं कि यह वृंदावन श्री किशोरी जी की राजधानी है, जिसका अखंड तेज चौदहों लोकों में फैला हुआ है। इसके जैसा कोई और धाम नहीं है। [3]
बिना श्री राधिका की दासी बने, उनकी सेवा किए, किसने इस वृंदावन के अद्भुत दुर्लभ रस का अनुभव किया है? [4]
बड़े बड़े मुनी ज्ञानी वास हेत ललचानी मती,
वेदहू नें नेत नेत कह गायौ है। [1]
मोहन के प्यारे भारे ध्यान धर धर हारे,
तिनहूँ कौ याकौ ना प्रभाव दरसायौ है॥ [2]
'लाल बलबीर' राजधानी श्रीकिशोरी जू की,
चौधेहू भुवन में अखण्ड तेज छायौ है। [3]
राधिका की दासी सुखरासी जौलों होय नहीं,
तौलो बनराज जू कौ कौने रस पायो है॥ [4]
- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री वृंदावन शतक (25)
बड़े-बड़े मुनि और ज्ञानी भी वृंदावन में वास करने के लिए लालायित रहते हैं। यह वही धाम है, जिसे वेदों ने "नेति-नेति" कहकर गाया है, अर्थात जिसकी महिमा का वर्णन वे भी पूर्ण रूप से नहीं कर पाए। [1]
श्री कृष्ण के नित्य सिद्ध भक्तों के लिए भी इस निकुंज वृंदावन का साक्षात्कार दुर्लभ है। यहां का दिव्य प्रभाव ऐसा है कि वे भी इसे संपूर्णता में नहीं देख पाए हैं और इस अनूठे रस से अपरिचित ही रहे हैं। [2]
श्री लाल बलबीर जी कहते हैं कि यह वृंदावन श्री किशोरी जी की राजधानी है, जिसका अखंड तेज चौदहों लोकों में फैला हुआ है। इसके जैसा कोई और धाम नहीं है। [3]
बिना श्री राधिका की दासी बने, उनकी सेवा किए, किसने इस वृंदावन के अद्भुत दुर्लभ रस का अनुभव किया है? [4]

