यही है यही है, भूलि भरमो न कोउ।
भूलि भरमें तें, भव भटक मरिहौं॥
- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सिद्धान्त सुख (12)
साधकगण नित्य-वृंदावन को इस पृथ्वी पर स्थित वृंदावन से पृथक न समझें। इसी कारण श्री हरिव्यास देवाचार्य बार-बार कहते हैं—“यही है, यही है”; अर्थात यही वह नित्य-वृंदावन अभेद रूप से स्थित है। इसलिए भूलकर भी अपने को भ्रम में मत डालना। यदि भ्रम में पड़ गए, तो निश्चित ही रस-मार्ग रुक जाएगा और परमार्थ से भटककर न जाने कहाँ गति होगी।
भूलि भरमें तें, भव भटक मरिहौं॥
- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सिद्धान्त सुख (12)
साधकगण नित्य-वृंदावन को इस पृथ्वी पर स्थित वृंदावन से पृथक न समझें। इसी कारण श्री हरिव्यास देवाचार्य बार-बार कहते हैं—“यही है, यही है”; अर्थात यही वह नित्य-वृंदावन अभेद रूप से स्थित है। इसलिए भूलकर भी अपने को भ्रम में मत डालना। यदि भ्रम में पड़ गए, तो निश्चित ही रस-मार्ग रुक जाएगा और परमार्थ से भटककर न जाने कहाँ गति होगी।

