तजि तीरथ हरि-राधिका - श्रीमहाकवी बिहारी लाल, बिहारी सतसई (4)

तजि तीरथ हरि-राधिका - श्रीमहाकवी बिहारी लाल, बिहारी सतसई (4)

तजि तीरथ हरि-राधिका, तन-दुति करि अनुराग।
जिहिं ब्रज-केलि निकुंज-मग, पग-पग होत प्रयाग॥

- श्रीमहाकवी बिहारी लाल, बिहारी सतसई (4)

अन्य समस्त तीर्थों का त्याग कर केवल श्री राधा-कृष्ण की दिव्य अंग-कान्ति से ही अनन्य अनुराग करो। जिस ब्रज के निकुञ्ज-मार्गों में प्रिया-प्रीतम नित्य क्रीड़ा करते हैं, वहाँ का पग-पग साक्षात् 'प्रयाग' के समान पावन है।