जो तुम बनावौगे सोई बनिहै मेरो सोच कहा ।
अब लौ तुम सब नीकी बनाई बनाइहौ नीकी महा । [1]
मंगलमूरति सब सुखदायक ब्रजनायक गुन-निकर अहा ।
दीन पपीहा त्यौं ढरिबो आनँदघन टेक लहा ।। [2]
- श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, पदावली (720)
श्री आनंदघन कह रहे है "हे ब्रज के नायक श्री कृष्ण, मेरा जो भी भाग्य आप बनाओगे वही होगा, मेरे सोचने से कहाँ कुछ होगा। अब तक आपने मेरी बहुत अच्छी बनायी है, आगे भी मंगल ही होगा। [1]
हे मंगलमूरति, हे गुणों के सागर, हे सब सुखदायक श्री कृष्ण, “जो भी परिस्थिति आप दोगे चाहे अच्छी या बुरी, उसे मैं आपका प्रसाद समझ कर ग्रहण करूँगा, यह मेरा दृढ निश्चय है।" [2]
अब लौ तुम सब नीकी बनाई बनाइहौ नीकी महा । [1]
मंगलमूरति सब सुखदायक ब्रजनायक गुन-निकर अहा ।
दीन पपीहा त्यौं ढरिबो आनँदघन टेक लहा ।। [2]
- श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, पदावली (720)
श्री आनंदघन कह रहे है "हे ब्रज के नायक श्री कृष्ण, मेरा जो भी भाग्य आप बनाओगे वही होगा, मेरे सोचने से कहाँ कुछ होगा। अब तक आपने मेरी बहुत अच्छी बनायी है, आगे भी मंगल ही होगा। [1]
हे मंगलमूरति, हे गुणों के सागर, हे सब सुखदायक श्री कृष्ण, “जो भी परिस्थिति आप दोगे चाहे अच्छी या बुरी, उसे मैं आपका प्रसाद समझ कर ग्रहण करूँगा, यह मेरा दृढ निश्चय है।" [2]

