हमरे सुख कौ वपु बन्यौ - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, रस की साखी (105)

हमरे सुख कौ वपु बन्यौ - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, रस की साखी (105)

हमरे सुख कौ वपु बन्यौ, कुंजबिहारिनि बाल।
ललित किसोरी लाड़िली, अद्भुत रूप रसाल॥

- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, रस की साखी (105)

नित्य निभृत निकुंज में अपने प्राणप्रियतम श्री कुंजविहारी के संग नित्य केलि-विहार करने वाली रसस्वरूपा कुंजविहारिणी लाड़िली हमारे सुख का ही स्वरूप बनी हुई हैं। उनका वपु-देह हमारे सुख के लिए ही सुखस्वरूप प्रकट हुआ है। ऐसे रस से परिपूर्ण अद्भुत रसाल रूप वाली ललित किशोरी लाड़िली हमें नित्य ही अद्भुत सुख प्रदान करती हैं।