अब विलम्ब जिन करहुँ लाड़िली - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी

अब विलम्ब जिन करहुँ लाड़िली - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी

(राग देश)
अब विलम्ब जिन करहुँ लाड़िली कृपा दृष्टि टुक हेरो।
यमुना पुलिन मलिन गहवर की बिचरूँ साँज सवेरो ॥ [1]
निसि दिन निरखूँ युगल माधुरी रसिकनते भव भैरो
ललित किशोरी तन मन व्याकुल जीवन चरण बसेरो ॥ [2]

- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी , विनय (26)

हे लाड़िली जी, अब तनिक भी विलंभ न करें एवं मुझ पर कृपा की दृष्टि डालें । ऐसी कृपा करिए कि मैं साँझ सवेरे यमुना पुलिन एवं गहवर वन में विचरण करूँ । [1]

प्रत्येक दिन अब मैं केवल युगल माधुरी को ही निहारूँ एवं रसिक भक्तों का ही संग करूँ, ऐसी आशा है। हे प्रिया जी, अब मेरा तन मन आपके लिए व्याकुल हो रहा है, अब ऐसा बनाव बना दीजिए जिससे मेरे जीवन का हर क्षण आपके चरण शरण में ही बीते [अर्थात मुझे अपने चरण शरण में रखिए] । [2]