जाके मन में बसि रही, मोहन की मुसिक्यान।
नारायण ताके हिये, और न लागत ज्ञान॥
- श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (172)
जिसके मन में मोहन की मुस्कान बस जाती है, उसके ऊपर फिर किसी अन्य ज्ञान का प्रभाव नहीं रहता।
नारायण ताके हिये, और न लागत ज्ञान॥
- श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (172)
जिसके मन में मोहन की मुस्कान बस जाती है, उसके ऊपर फिर किसी अन्य ज्ञान का प्रभाव नहीं रहता।

