झुलत डोल दोऊ जन ठाढ़े - श्री स्वामी हरिदास जी, केलिमाल (107)

झुलत डोल दोऊ जन ठाढ़े - श्री स्वामी हरिदास जी, केलिमाल (107)

(राग गौरी)
झुलत डोल दोऊ जन ठाढ़े।
हाँगत जोर सहित जैसौ जाकैं डाँड़ीब गहैं गाढ़े॥
बिच बिच प्रीति रहसि रस रीति की
राग रागिनीन के जूथ बाढ़े।
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारी
राग ही के रंग रंगि काढ़े॥

- श्री स्वामी हरिदास जी, केलिमाल (107)

आज दोऊ जन [श्री राधा कृष्ण ] आनंद में संलग्न झूला झूल रहे हैं । महा यौवन की प्रबलता से भरे वे झूले के डंडी-रस्सी अपने हस्त कमलों से पकड़े हुए एवं झूले को तीव्र गति से झूला रहे हैं ।
बीच बीच में इस रस रीति का अद्बुत वर्धन हो रहा है, राग और रागिनी के सुख सागर में अनुराग रस की वृद्धि निरंतर हो रही है।श्री हरिदासी सखी के श्री श्यामा कुंजबिहारी आज प्रेम रंग में भीगे हुए हैं ।