कोटि तप साधि कृश कर ले शरीर किन्तु - ब्रज के कवित्त

कोटि तप साधि कृश कर ले शरीर किन्तु - ब्रज के कवित्त

(कवित्त)
कोटि तप साधि कृश कर ले शरीर किन्तु,
कबहू न तन के घटे ते श्याम रीझे हैं। [1]
अन्न वस्त्र भूमि गज धेनु तू लुटायौ कर,
नेकहू न दान के किये ते श्याम रीझे हैं॥ [2]
बिन्दु योग जप तप संयम नियम धारि,
तदपि न हठ पै डटे ते श्याम रीझे हैं। [3]
काम ते न रीझे धन धाम ते न रीझे,
एक राधे राधे नाम के रटे ते श्याम रीझे हैं॥ [4]
- ब्रज के कवित्त

कोटि-कोटि तप और साधना भी यदि इस शरीर से की जाएं, तब भी केवल शारीरिक प्रयासों से श्री कृष्ण को नहीं रिझाया जा सकता। [1]

आप चाहे भोजन, वस्त्र, भूमि, हाथी, गाय, इत्यादि कितना भी दान करें, उस दान से भी श्री कृष्ण को प्रसन्न नहीं किया जा सकता। [2]

योग, जप, तप, संयम, व्रत, नियम आदि का अनंत कोटि बार भी हृदय में धारण कर हठ पर डटे रहें, फिर भी श्री कृष्ण नहीं रीझेंगे। [3]

न तो वे कर्म-धर्म से रीझते हैं, न ही धन-धाम से। यदि आप वास्तव में श्री कृष्ण को शीघ्र प्रसन्न करना चाहते हैं, तो एक ही उपाय है—"राधे-राधे" नाम का नित्य रटन करें। [4]