ब्रज रज जाकूँ मिलि गयी - ब्रज के दोहे

ब्रज रज जाकूँ मिलि गयी - ब्रज के दोहे

ब्रज रज जाकूँ मिलि गयी, वाकी चाह न शेष।
ब्रज की चाहत मैं रहैं, ब्रह्माँ विष्णु महेश्॥

- ब्रज के दोहे

जिसे ब्रज की रज प्राप्त हो जाती है, उसकी कोई इच्छा शेष नहीं रह जाती; क्योंकि ब्रज की लालसा तो नित्य ही ब्रह्मा, विष्णु और शिवजी आदि को भी बनी रहती है।