फटिकसिलान के महल महारानी बैठी - श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (24)

फटिकसिलान के महल महारानी बैठी - श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (24)

(कवित्त)
फटिकसिलान के महल महारानी बैठी,
सुरन की रानी जुरि आई मन-भावतीं। [1]
कोऊ जलदानी पानदानी पीकदानी लिए,
कोऊ कर बीनै लै सुहाये गीत गावतीं॥ [2]
कोऊ चौंर ढारैं चारु चाँदनी-से चौजबारे,
'हठी' लै सुगंधन-सी अलकैं बनावतीं। [3]
मोतिन के मनिन के पत्रन के प्रवालन के,
लालन के, हीरन के हार पहिनावतीं॥ [4]

- श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (24)

स्फटिक की शिलाओं से निर्मित भव्य महल में श्री वृंदावन की महारानी श्री राधारानी विराजमान हैं। देवताओं की रानियाँ, उनकी दासता से अभिभूत हैं, हाथ जोड़े उनके समक्ष उपस्थित हो रही हैं, और उनके हृदय श्री राधा के दिव्य दर्शन की लालसा है । [1]

उन देव रानियों में से कुछ ने जलदानी ले ली है, कुछ ने पानदानी, और कुछ ने पीकदानी। वहीं, कोई हाथ जोड़कर श्री राधा के सामने खड़ी होकर मधुर गीत सुना रही है। [2]

श्री हठी जी कहते हैं कि कुछ देव सखियाँ सुंदर चँवर डुला रही हैं, चारों ओर चाँदनी का मनोहर प्रकाश फैला हुआ है, और कोई सखी श्री राधारानी के सुगंधित केशों को संवार रही है। [3]

कुछ देव पत्नियाँ श्री किशोरी जी को मोतियों, मणियों, पन्नों और हीरों की मालाएँ पहना रही हैं। इस प्रकार आज देव पत्नियों को श्री राधारानी की सेवा का अद्भुत अवसर प्राप्त हुआ है। [4]