हों इन मोरन की बलिहारी - श्री सूरदास, सूर सागर

हों इन मोरन की बलिहारी - श्री सूरदास, सूर सागर

(राग मल्हार)
हों इन मोरन की बलिहारी ।
जिनकी सुभग चन्द्रिका माथे धरत गोवर्धन धारी ।। 1 ।।
बलिहारी या बंसकुल सजनी बंसी सी सकुमारी ।
सुन्दर कर सोहे मोहन के नेकहू होत न न्यारी ।। 2 ।।
बलिहारी गुंजा की जात पर महाभाग्य की सारी ।
सदां हृदय पे श्याम के छिनहु टरत न टारी ।। 3।।
बलिहारी ब्रज भूमि मनोहर कुँजन की अनुहारी ।
सूरदास प्रभु नंगे पायन अनुदिन गैय्या चारी ।। 4 ।।

- श्री सूरदास, सूर सागर

श्री सूरदास कहते हैं “मैं इन मोरों पर बलिहार जाता हूँ जिनके पंख गिरिधर श्री कृष्ण के मुकुट पर टिके रहते हैं। [1]

मैं इस बांस के वंश पर बलिहार जाता हूँ, जिसकी प्यारी बेटी बांसुरी बन गई है, जिसे भगवान अपने सुन्दर हाथों में संजोए हुए हैं। [2]

मैं इस गुंजा पुष्प पर बलिहार जाता हूँ और इसके धन्य भाग्य की भी प्रशंसा करता हूं, जिसे हर प्रकार के सौभाग्य की प्राप्ति होती है, जिसे श्री कृष्ण सदैव अपने ह्रदय से लगाए रहते हैं। [3]

श्री सूरदास जी कहते हैं कि मैं ब्रज की परम पावन भूमि पर बलिहार जाता हूँ, जिसके लता कुंजों में श्री कृष्ण नंगे पैर विहार करते हैं तथा उस भूमि में अपने गायों को चराते हैं।" [4]