(राग भैरव)
सब ऐश्वर्य छिपाइ पाइँ परि दीन भयौ अभिमानी।
प्रगट कियौ माधुर्य मधुररस रसिक - नरेस निसानी॥ [1]
नेति नेति निगमामग गावत, पावत नहीं बुधि-बानी।
भगवत रसिक रसिक सखियन सँग, अंखियाँ निरखि सिरानी॥ [2]
- श्री भगवत रसिक, श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (1.20.10)
जो हरि, अन्यत्र षड ऎश्वर्य के अभिमानी है, वे यहाँ अपना सारा बड्डपन छिपाकर और श्री किशोरीजी के चरण कमलो में पड़े रहकर अत्यंत दीन बने रहते है। इन्होने मधुर रस का जो माधुर्य प्रकट किया है, उसकी एकमात्र ध्वजा रसिकनरेश स्वामी श्रीहरिदास जी महाराज हैं। [1]
यह रस बड़ा दुर्गम है। इसका गान वेद नेति नेति पूर्वक करते है, बुद्धि इसे पा नहीं सकती और वाणी इसका वर्णन नहीं कर सकती। भगवत रसिक जी कहते है कि रसिक सखियाँ की संगति के प्रभाव से हमारी आँखे सदा ही इस माधुरी का अवलोकन करती हुई शीतल होती रहती है। [2]
सब ऐश्वर्य छिपाइ पाइँ परि दीन भयौ अभिमानी।
प्रगट कियौ माधुर्य मधुररस रसिक - नरेस निसानी॥ [1]
नेति नेति निगमामग गावत, पावत नहीं बुधि-बानी।
भगवत रसिक रसिक सखियन सँग, अंखियाँ निरखि सिरानी॥ [2]
- श्री भगवत रसिक, श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (1.20.10)
जो हरि, अन्यत्र षड ऎश्वर्य के अभिमानी है, वे यहाँ अपना सारा बड्डपन छिपाकर और श्री किशोरीजी के चरण कमलो में पड़े रहकर अत्यंत दीन बने रहते है। इन्होने मधुर रस का जो माधुर्य प्रकट किया है, उसकी एकमात्र ध्वजा रसिकनरेश स्वामी श्रीहरिदास जी महाराज हैं। [1]
यह रस बड़ा दुर्गम है। इसका गान वेद नेति नेति पूर्वक करते है, बुद्धि इसे पा नहीं सकती और वाणी इसका वर्णन नहीं कर सकती। भगवत रसिक जी कहते है कि रसिक सखियाँ की संगति के प्रभाव से हमारी आँखे सदा ही इस माधुरी का अवलोकन करती हुई शीतल होती रहती है। [2]

