हमारो, दोउ प्यारी प्यारो ।
एक गौर तनु एक नील - तनु, दोउ नैननि - तारो ।। [1]
इक धारो नीलांबर अरु इक, पीतांबर धारो ।
इक सोरह श्रृंगारहिं छवि इक, नटवर - छवि वारो ।। [2]
इक भोरी अति इक अति चंचल, दोउ त्रिभुवन न्यारो ।
कह ‘कृपालु’ जब होति होड़ तब, कोउ नहिं कोउ हारो ।। [3]
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, युगल माधुरी (22)
प्रिया - प्रियतम दोनों ही हमारे सर्वस्व हैं । एक गौर वर्ण और एक नील वर्ण के हैं तथा दोनों ही मेरी आँखों के तारों के समान हैं । [1]
एक नीलाम्बर धारण किये हुए हैं एवं एक पीताम्बर धारण किये हुए हैं । एक सोलहों श्रृंगार से अलंकृत हैं, एवं एक नटवर वेष से अलंकृत हैं । [2]
एक स्वभावत: अत्यन्त भोली हैं, और एक स्वभावत: अत्यन्त चंचल हैं । दोनों ही संसार से निराले हैं, क्योंकि दिव्य चिन्मय हैं । ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं जब दोनों में किसी प्रकार की रसमयी होड़ हो जाती है तब कोई भी किसी से हार नहीं मानता क्योंकि स्वरूपत:, परमार्थत: दोनों एक ही हैं । [3]

