(राग मल्हार)
कुँवर चलो जू आगे गहवर में जहाँ बोलत मधुरै मोर ।
विकसित वन राजीव तहाँ कोकिला करत रोर ।। [ 1 ]
मधुरे वचन सुनत प्रीतम के लीनो प्यारी चित्त चोर ।
गोविन्द बलि बलि पिय प्यारी की जोर ।। [ 2 ]
विकसित वन राजीव तहाँ कोकिला करत रोर ।। [ 1 ]
मधुरे वचन सुनत प्रीतम के लीनो प्यारी चित्त चोर ।
गोविन्द बलि बलि पिय प्यारी की जोर ।। [ 2 ]
- श्री गोविन्द स्वामी, श्री गोविन्द स्वामी जी की वाणी (188)
श्री कृष्ण गह्वर के भीतर चलते हैं जहाँ मोर मधुर स्वर में बोल रहे हैं । समस्त गह्वर वन के सभी वृक्ष फल फूल रहे हैं और कोयल मधुर स्वर से गान कर रही है । [1]
प्रियत श्रीकृष्ण की मधुर वाणी से श्री राधिका जू का हृदय मोहित हो गया है । श्री गोविंद दास जी इस छवी को निहार कर बार बार बलिहार जा रहे हैं । [2]

