नो शृण्वन् नैव गृह्णन् सकलतनुभृतां क्वापि दोषं गुणं वा
वृन्दावनस्थ सत्त्वान्यखिल-गुरुधिया सनमन् दण्डपातैः।
त्यक्ताशेषाभिमानो निरवधि परमाकिञ्चनः कृष्णराधा-
प्रेमानन्दाश्रु मुञ्चन् निवसति सुकृती कोऽपि वृन्दावनान्तः।।
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (2.53)
समस्त जीवों के दोषों तथा गुणों को न कहीं सुनता हुआ और न ही ग्रहण करता हुआ, सब वृन्दावनवासी प्राणियों में गुरु-बुद्धि से दण्डवत प्रणाम करता हुआ, सब अभिमान छोड़ कर एवं निरन्तर परम निष्किञ्चन भाव से श्री राधा कृष्ण के प्रेमानन्द में अश्रु बहाता हुआ कोई पुण्यात्मा ही श्रीवृन्दावन में वास करता है।
वृन्दावनस्थ सत्त्वान्यखिल-गुरुधिया सनमन् दण्डपातैः।
त्यक्ताशेषाभिमानो निरवधि परमाकिञ्चनः कृष्णराधा-
प्रेमानन्दाश्रु मुञ्चन् निवसति सुकृती कोऽपि वृन्दावनान्तः।।
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (2.53)
समस्त जीवों के दोषों तथा गुणों को न कहीं सुनता हुआ और न ही ग्रहण करता हुआ, सब वृन्दावनवासी प्राणियों में गुरु-बुद्धि से दण्डवत प्रणाम करता हुआ, सब अभिमान छोड़ कर एवं निरन्तर परम निष्किञ्चन भाव से श्री राधा कृष्ण के प्रेमानन्द में अश्रु बहाता हुआ कोई पुण्यात्मा ही श्रीवृन्दावन में वास करता है।

