(दोहा)
भर्म तजौ हरिप्रिया भजौ, सजौ अनन्य ब्रत एक।
यही यही निस्चय कही, सही गही उर टेक॥
(पद)
यही है यही है भूलि भरमो न कोउ , भूलि भरमें तें भव भटक मरिहौं।
लाडिली लाल के नित्य सुखसार बिन कौन बिधि वारतें पार परिहौं॥
एक अनन्य की टेक उर में धरौ , परिहरौ भर्म ज्यौं फूलि फरिहौ।
श्रिया हरिप्रिया के परम पद पासु ही आसु अनयासु ही बासु करिहौं॥
- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सिद्धान्त सुख (12)
(दोहा)
समस्त भ्रमों का त्याग कर श्री राधा कृष्ण को भजो; एक अनन्य व्रत धारण कर, निश्चित ही श्री वृंदावन धाम का हृदय से आश्रय ग्रहण कर वहाँ नित्य वास करो।
(पद)
साधक गन नित्य वृंदावन को इस भूमि पर स्थित वृंदावन से प्रथक न समझें, इसलिए श्री हरिव्यास देवाचार्य पुनः पुनः कहते हैं कि “यही है यही है” अर्थात यह वही नित्य वृंदावन अभेद रूप से स्थित है, अपने को भूल कर भी भ्रम में मत डाल लेना। यदि भ्रम में डाल लिया तो निस्चित ही रस मार्ग रुक जाएगा, और परमार्थ से भटक कर न जाने कहाँ मरोगे। सुख सागर स्वरूप श्री लाडिली लाल को छोड़कर इस संसार रूपी सागर के वारि से यह जीव किसी और विधि पार नहीं पा सकता। एक अनन्य व्रत हृदय में धारण कर समस्त भ्रमों को त्याग कर, श्री राधा कृष्ण के चरणों के पास वृंदावन में नित्य वास करो।
भर्म तजौ हरिप्रिया भजौ, सजौ अनन्य ब्रत एक।
यही यही निस्चय कही, सही गही उर टेक॥
(पद)
यही है यही है भूलि भरमो न कोउ , भूलि भरमें तें भव भटक मरिहौं।
लाडिली लाल के नित्य सुखसार बिन कौन बिधि वारतें पार परिहौं॥
एक अनन्य की टेक उर में धरौ , परिहरौ भर्म ज्यौं फूलि फरिहौ।
श्रिया हरिप्रिया के परम पद पासु ही आसु अनयासु ही बासु करिहौं॥
- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सिद्धान्त सुख (12)
(दोहा)
समस्त भ्रमों का त्याग कर श्री राधा कृष्ण को भजो; एक अनन्य व्रत धारण कर, निश्चित ही श्री वृंदावन धाम का हृदय से आश्रय ग्रहण कर वहाँ नित्य वास करो।
(पद)
साधक गन नित्य वृंदावन को इस भूमि पर स्थित वृंदावन से प्रथक न समझें, इसलिए श्री हरिव्यास देवाचार्य पुनः पुनः कहते हैं कि “यही है यही है” अर्थात यह वही नित्य वृंदावन अभेद रूप से स्थित है, अपने को भूल कर भी भ्रम में मत डाल लेना। यदि भ्रम में डाल लिया तो निस्चित ही रस मार्ग रुक जाएगा, और परमार्थ से भटक कर न जाने कहाँ मरोगे। सुख सागर स्वरूप श्री लाडिली लाल को छोड़कर इस संसार रूपी सागर के वारि से यह जीव किसी और विधि पार नहीं पा सकता। एक अनन्य व्रत हृदय में धारण कर समस्त भ्रमों को त्याग कर, श्री राधा कृष्ण के चरणों के पास वृंदावन में नित्य वास करो।

