नंद के लाल हरयौं मन मोर ।
हौं अपने मोतिनु लर पोवति, काँकरी डारि गयो सखि भोर ।। [1]
बंक बिलोकनि चाल छबीली, रसिक सिरोमनि नंद किसोर ।
कहि कैसें मन रहत श्रवन सुनि, सरस मधुर मुरली की घोर ।। [2]
इंदु गोबिंद वदन के कारन, चितवन कौं भये नैंन चकोर ।
(जै श्री ) हित हरिवंश रसिक रस जुवती तू लै मिलि सखि प्राण अँकोर ।। [3]
- श्री हरिवंश महाप्रभु , श्री हित चौरासी (13)
श्रीप्रियाजी ने कहा- “ सखि ! नन्द नन्दन ने तो मेरा मन हर लिया है । मैं अपने भवन में बैठी मुक्ता माल पिरो रही थी उन्होंने सबेरे सबेरे मुझ पर काँकरी फेंक कर मेरी तन्मयता भंग करके अपनी ओर आकृष्ट कर लिया । [1]
नयनाभिराम रसघन मोहन मूर्ति नन्द किशोर की तिरछी चितवन एवं मद मत्त पद गति को देखकर तथा उनके अधरों से मधुर रस पूर्ण वंशी स्वर को सुनकर किस प्रकार मन स्थिर रह सकता है ? [2]
चंद्र समान श्याम के मुख दर्शन के लिये मेरे नेत्र चकोर समान तृषित हैं । श्रीहित हरिवंश कहते हैं कि श्रीप्रिया मुख से उपरोक्त बात सुनकर ( सखी ने कहा कि हे युवति ! तुम प्राणों को न्यौछावर करती हुई अपने प्रियतम रसिक वर लाल का मिलन प्राप्त करो । [3]
हौं अपने मोतिनु लर पोवति, काँकरी डारि गयो सखि भोर ।। [1]
बंक बिलोकनि चाल छबीली, रसिक सिरोमनि नंद किसोर ।
कहि कैसें मन रहत श्रवन सुनि, सरस मधुर मुरली की घोर ।। [2]
इंदु गोबिंद वदन के कारन, चितवन कौं भये नैंन चकोर ।
(जै श्री ) हित हरिवंश रसिक रस जुवती तू लै मिलि सखि प्राण अँकोर ।। [3]
- श्री हरिवंश महाप्रभु , श्री हित चौरासी (13)
श्रीप्रियाजी ने कहा- “ सखि ! नन्द नन्दन ने तो मेरा मन हर लिया है । मैं अपने भवन में बैठी मुक्ता माल पिरो रही थी उन्होंने सबेरे सबेरे मुझ पर काँकरी फेंक कर मेरी तन्मयता भंग करके अपनी ओर आकृष्ट कर लिया । [1]
नयनाभिराम रसघन मोहन मूर्ति नन्द किशोर की तिरछी चितवन एवं मद मत्त पद गति को देखकर तथा उनके अधरों से मधुर रस पूर्ण वंशी स्वर को सुनकर किस प्रकार मन स्थिर रह सकता है ? [2]
चंद्र समान श्याम के मुख दर्शन के लिये मेरे नेत्र चकोर समान तृषित हैं । श्रीहित हरिवंश कहते हैं कि श्रीप्रिया मुख से उपरोक्त बात सुनकर ( सखी ने कहा कि हे युवति ! तुम प्राणों को न्यौछावर करती हुई अपने प्रियतम रसिक वर लाल का मिलन प्राप्त करो । [3]

