नाचि अचानक हीं उठे - श्रीमहाकवी बिहारी लाल, बिहारी सतसई (11)

नाचि अचानक हीं उठे - श्रीमहाकवी बिहारी लाल, बिहारी सतसई (11)

नाचि अचानक हीं उठे, बिनु पावस बन मोर।
जानति हौं नन्दित करी, यहि दिसि नंद-किसोर॥
- श्रीमहाकवी बिहारी लाल, बिहारी सतसई (11)

बिना वर्षा-ऋतु के ही ब्रज के वन में मोर अचानक नाच उठे। जान पड़ता है कि इस दिशा को नन्द के लाड़ले (घनश्याम) ने आनन्दित किया है।