श्रीगान्धर्वासम्प्रार्थनाष्टकम् - श्री रूप गोस्वामी

श्रीगान्धर्वासम्प्रार्थनाष्टकम् - श्री रूप गोस्वामी

वृन्दावने विहरतोरिह किलेकुञ्जे
मत्तद्विपप्रवरकौतुकविभ्रमेण ।
सन्दर्शयस्व युवयोर्वदनारविन्द
द्वन्द्वं विधेहि मयि देवि कृपां प्रसीद ।। [1]


हे राधिके! मुझ पर कृपा कर अपना मुख कमल मेरे समक्ष ऐसे प्रकट करें, जब आप और श्री कृष्ण, मद गज के समान प्रेम में लीन वृन्दावन के कुंजो में विहार करते हैं।

हा देवि काकुभरगद्गदयाद्य वाचा
याचे निपत्य भुवि दण्डवदुद्भटार्तिः ।
अस्य प्रसादमबुधस्य जनस्य कृत्वा
गान्धर्विके निजगणे गणनां विधेहि ।।  [2]


हे देवी! स्वयं को बेसहाय एवं पराजित समझते हुए [अर्थात अत्यंत दीन भाव से], स्वयं को दंडवत आपके समक्ष रखते हुए, विनय पूर्वक डगमगाती हुई वाणी से मैं आपसे प्राथना करूँगा। हे गान्धर्विके ! क्या इस मूढ़ पर आपकी कृपा हो जाने के पश्चात आप इसे अपने ही जन में गिनेंगी?

श्यामे रमारमणसुन्दरतावरिष्ठ
सौन्दर्यमोहितसमस्तजगज्जनस्य ।
श्यामस्य वामभुजबद्धतनुं कदाहं
त्वामिन्दिराविरलरूपभरां भजामि ।। [3]


हे श्यामा (श्री राधे)! मैं कब आपको इंदिरा (लक्ष्मी) के रूप में भजूँगा, जब आपका तन श्री कृष्ण की बायीं भुजा से जुड़ा होगा? जिन श्री कृष्ण की सुंदरता समस्त लोकों के समस्त जीवों को मोहित कर देती है और रमापति (भगवान विष्णु, लक्ष्मी के पति) से भी अधिक है।

त्वां प्रच्छदेन मुदिरच्छविना पिधाय
मञ्जीरमुक्तचरणां च विधाय देवि ।
कुञ्जे व्रजेन्द्रतनयेन विराजमाने
नक्तं कदा प्रमुदितामभिसारयिष्ये ।। [4]

हे देवी! कब मैं आपके शरीर में नीली साड़ी धारण करवाकर, आपके चरणों से नूपुर को मुक्त करवाकर, ब्रजराज [श्री कृष्ण] के संग आपका मिलन करवाऊँगी?

कुञ्जे प्रसूनकुलकल्पितकेलितल्पे
संविष्टयोर्मधुरनर्मविलासभाजोः ।
लोकत्रयाभरणयोश्चरणाम्बुजानि
संवाहयिष्यति कदा युवयोर्जनोऽयम् ॥ [5]


हे राधिके! ऐसा कब होगा जब आप वृन्दावन की कुंजों में फूलों से युक्त शय्या पर प्रियतम श्री कृष्ण के संग हास परिहास परायण होंगी और मैं आपके चरण कमल, जो तीनों लोकों को लुभाते हैं, उन चरणों की सेवा [अंगमर्दन] करुँगी?

त्वत्कुण्डरोधसि विलासपरिश्रमेण
स्वेदाम्बुचुम्बिवदनाम्बुरुहश्रियो वाम् ।
वृन्दावनेश्वरि कदा तरुमूलभाजो
संवीजयामि चमरीचयचामरेण ।। [6]


हे वृंदावन की महारानी, श्री राधिके! ऐसा कब होगा जब आप अपने प्रियतम संग अपने निज कुण्ड [श्री राधा कुंड] में लीला विलास परायण के पश्चात, थक कर, किसी वृक्ष के नीचे विश्राम अवस्था में होंगी,  जब आपके चहरे पर स्वेद की बूंदे होंगी, तब मैं आपको पंखा [रत्नों से जटित] करूंगी?

लीनां निकुञ्जकुहरे भवतीं मुकुन्दे
चित्रैव सूचितवतीं रुचिराक्षि नाहम् ।
भुग्नां भ्रुवं न रचयेति मृषारुषां त्वां
अग्रे व्रजेन्द्रतनयस्य कदा नु नेष्ये ।। [7]

हे सुनयन [सुंदर नेत्रों से युक्त], वह मैं नहीं थी जिसने मुकुंद को बताया कि तुम कुंजों के किस कोने में छिपी हो ! चित्रा ने सूचित किया है !  कृपया मुझपर अपना रोष न प्रकट कर करें! कब मैं आपको ब्रज राज [श्री कृष्ण] के समक्ष ले चलूँ ?

वाग्युद्धकेलिकुतुके व्रजराजसूनुं
जित्वोन्मदामधिकदर्पविकासिजल्पाम् ।
फुल्लाभिरालिभिरनल्पमुदीर्यमाण
स्तोत्रां कदा नु भवतीमवलोकयिष्ये ॥ [8]


हे राधे, जब आप ब्रजराज श्री कृष्ण को हास परिहास में पराजित कर देंगी, तब आप और भी अधिक मद में भरकर, अपनी सखियों से वार्ता करेंगी, तब वह भी आपकी प्रशंसा करेंगी, क्या मैं इस लीला को देखूंगी?

यः कोऽपि सुष्ठु वृषभानुकुमारिकायाः
संप्रार्थनाष्टकमिदं पठति प्रपन्नः ।
सा प्रेयसा सह समेत्य धृतप्रमोदा
तत्र प्रसादलहरीमुररीकरोति ।। [9]


जो जीव श्री वृषभानु कुमारी श्री राधिका जू की इन अष्ट प्रार्थना के सूत्रों का चिंतन करेगा, वह श्री राधा कृपा से श्री राधा द्वारा स्वीकार किया जाएगा एवं उसके समक्ष श्री राधा एवं उनके प्रियतम [प्रफुल्लित होकर] प्रकट होंगे ।

इति श्रीरूपगोस्वामिविरचितस्तवमालायां श्रीगान्धर्वासंप्रार्थनाष्टकं सम्पूर्णम् ।

इस प्रकार श्री गान्धर्वासंप्रार्थनाष्टकं सम्पूर्ण होता है।