(कवित्त)
जाकौं नेत नेत कहि वेदन बखान्यौ,
जाकौं नेत नेत कहि वेदन बखान्यौ,
ईश ध्यान में न आनौं अचरज सुखदानी है। [1]
और कौन पावै मति शारदा की सकुचावै,
याके देखिबे कौं कमला सी ललचानी हैं॥ [2]
'लाल बलबीर' भुज मेलि करें केलि दोऊ,
हिये सुख झेल सेवें सखी गुनखानी हैं। [3]
चौधेहु भुवन परयंत थाने जाने यहाँ,
स्यामा-स्याम राजा बनराज राजधानी हैं॥ [4]
- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री वृंदावन शतक (17)
जिस अद्वितीय रस को वेद भी "नेति-नेति" कहकर बखान करने में असमर्थ रहे हैं, जिसे स्वयं ब्रह्मा, शंकर आदि ईश्वर भी अपने ध्यान में नहीं ला सकते, जो अत्यंत गूढ़ और रहस्यमय है, और जिसका सुख अनिर्वचनीय है। [1]
अन्य किसी का क्या कहना, स्वयं सरस्वती की बुद्धि भी इसे समझने में असमर्थ है, और यह एक ऐसा अलौकिक रस है जिसे निहारने के लिए स्वयं महालक्ष्मी भी नित्य लालायित रहती हैं। [2]
श्री लाल बलबीर जी कहते हैं कि जब श्री राधा-कृष्ण अपने प्रेम का रस बरसाते हैं, तो वह रस केवल सखियों और श्री राधा की दासियों के लिए ही सुलभ होता है, वही इस अद्वितीय रस को अनुभव कर सकती हैं, जो स्वयं समस्त गुणों की खानी हैं। [3]
इस अलौकिक रस का अनुभव चौदह भुवनों में कहीं और नहीं है, क्योंकि जहां राधा-कृष्ण राजा हैं और श्री वृंदावन धाम उनकी राजधानी है, वहीँ यह अद्भुत रस उपलब्ध है, अर्थात् यह रस केवल वृंदावन में ही सुलभ है। [4]

