नव निकुंज ग्रह नवल आगैं - श्री स्वामी हरिदास जी, केलिमाल (106)

नव निकुंज ग्रह नवल आगैं - श्री स्वामी हरिदास जी, केलिमाल (106)

(राग गौरी)
नव निकुंज ग्रह नवल आगैं
नवल बीना मध्य राग गौरी ठटी। [1]
मनौं दस इंदु पीयूज़ बरषत सुखद
चपल करजावली दृष्टि पिय की जटी॥ [2]
रीझि रीझि पिय देत भूषन बसन दाम उर
रसन दसननि धरत निरखि सारंग कटी। [3]
रसद श्री हरिदास बिहारी अंग अंग मिलत
अतन उदोह करत सुरति आरंभटी॥ [4]

- श्री स्वामी हरिदास जी, केलिमाल (106)

नवल निकुंज में नवल प्रियतम के समक्ष नवल वीना लिए श्री प्यारी जू [श्री राधा] ने गौरी राग का वादन आरम्भ किया  ।  प्रिया पिय से बोलीं- जैसा मैं सिखा रही हूँ, वैसी वीणा बजायें। वीणा के मध्य राग गौरी की थाट छेड़ी। पिय ने प्रिया जी की आज्ञानुसार चपलता से अपनी दसों उंगलियों से वीणा के तार छेड़े। उनकी उंगलियों के नखों के निशान प्रिया के वीणा रूपी अंगों पर ऐसे उभरे मानो दस चन्द्रमा एक साथ अमृत वर्षा कर रहे हों।
प्यारी से प्यारे ने दृष्टि मिलाते हुए पूछा- क्या इसी भांति वीणा बजाऊँ? प्यारी ने कहा- हाँ, तान-राग के बंधन को समझ प्रवीणता से, मन से वीणा बजायें। पिय को प्रिया की आज्ञा, इच्छानुसार तान राग से वीणा बजाते देख रीझ गई हैं। अंग से अंग, हिय से हिय लगा, कटि से कटि, गलबाँहीं मिला, अधर से अधर, रस के दाता हरिदासी जी के बिहारी-बिहारिनी दोनों के अंग संग की चाहना का प्रकाश बढ़ गया। सुंदर रति का प्रारंभ हुआ। हरिदासजी की कृपा एवं रसिकों के बिना प्रिया जी को कोई नहीं समझ सकता।