उधो, मन न भए दस बीस - श्री सूरदास

उधो, मन न भए दस बीस - श्री सूरदास

(राग रामकली)
उधो, मन न भए दस बीस।
एक हुतो सो गयौ स्याम संग, को अवराधै ईस॥ [1]
सिथिल भईं सबहीं माधौ बिनु जथा देह बिनु सीस।
स्वासा अटकिरही आसा लगि, जीवहिं कोटि बरीस॥ [2]
तुम तौ सखा स्यामसुन्दर के, सकल जोग के ईस।
सूरदास, रसिकन की बतियां पुरवौ मन जगदीस॥ [3]

- श्री सूरदास

गोपियां कहती है, हे उद्धव, मन तो हमारा एक ही है, दस-बीस मन तो हैं नहीं कि एक को किसी के लगा दें और दूसरे को किसी और में। अब वह भी नहीं है, कृष्ण के साथ अब वह भी चला गया हमारा नहीं रहा । तुम्हारे निर्गुण ब्रह्म की उपासना अब किस मन से करें ? [1]

गोपियां कहती हैं, "यूँ तो हम बिना सिर की-सी हो गई हैं,  तो भी श्याम-मिलन की आशा में इस सिर-विहीन शरीर में हम अपने प्राणों को करोड़ों वर्ष रख सकती हैं । [2] 

गोपियाँ व्यंग करते हुए कहती हैं : उद्धव, क्या कहना, तुम तो सखा हो श्याम सुंदर के,  तुम तो योगियों में भी शिरोमणि हो, श्री कृष्ण के अतिरिक्त हमारा कोई ईश्वर नहीं है [यह रसिकों का राज्य है] । [3]