हमारे धन वृन्दावन प्यारी - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (159)

हमारे धन वृन्दावन प्यारी - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (159)

(राग गौरी)
हमारे धन वृन्दावन प्यारी ।
खरचत खात घटै नहिं कबहूँ बाढत छिन छिन अति अधिकारी ।। [1]
ताही कौ अभिमान सदाई ताही बल बस कुंज बिहारी ।
श्री हरिदासी रसिक सिरोमनि प्रान प्रान मिलि कीनी यारी ॥ [2]

- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (159)

हमारा एकमात्र धन श्री वृंदावन धाम की लाड़िली श्री राधिका प्यारी ही हैं । यह ऐसा अद्भुत नित्य धन है जो जितना पान करो वह कभी भी कम नहीं होता, किन्तु नित्य प्रति बढ़ता ही जाता है एवं अपनत्व बढ़ता ही जा रहा है । [1]

इन वृंदावन की महारानी श्री राधे ज़ू के बल [एवं धन से] से सदा ही हम अभिमान में भरे रहते हैं [अर्थात हमारा उत्साह कभी कम नहीं होता] एवं श्री कृष्ण भी यही बल से भरे रहते हैं, वह भी इन्हीं के वश में रहते हैं [सब रस ठकुरानी जी की कृपा से ही है ] ।श्री ललित किशोरि देव जी कहते हैं कि रसिक शिरोमणि स्वामी श्री हरिदास जी [ललिता अवतार] अपने प्राणों से प्राण मिलाय अपना सर्वस्व श्री राधा पर बलिहार कर प्राणपन से श्रीराधिका ज़ू से नित्य ही यारी किए हुए हैं । [2]