(सवैया)
उर ऊपर नित्य रहूँ लटका, अपनी बनमाल का फूल बनादे। [1]
उर ऊपर नित्य रहूँ लटका, अपनी बनमाल का फूल बनादे। [1]
लहरें टकराती रहे जिसमें, कमनीय कलिन्दजा का कूल बनादे॥ [2]
कर कंजसे थामते हो जिसको, उस वृक्ष कदम्ब का मूल बना दे। [3]
पद पंकज तेरे छूयेंगे कभी, ब्रजराज ! हमें ब्रज धूल बनादे॥ [4]
- ब्रज के सेवैयाँ (श्री हरे कृष्ण जी द्वारा रचित)
हे नंदलाल! मुझे ऐसा बना दो कि मैं तुम्हारे हृदय से सदा लिपटा रहूँ, मुझे अपनी वनमाला का फूल बना दो। [1]
मुझे उस कलिंदी तट का अंश बना दो, जहाँ तुम्हारे प्रेम की लहरें मृदुल स्पर्श करती हैं और तुम्हारी मधुर मुरली की तान गूँजती है। [2]
जिस कदंब की डाल पर आप अपना हाथ रखकर खड़े होते हैं, मुझे उसी कदंब का वृक्ष बना दीजिए। [3]
और हे ब्रजराज! मुझे ऐसा बना दो कि कभी तुम्हारे चरण-कमल मुझे स्पर्श करें—क्यों न मुझे ब्रज की रज बना दो। [4]
मुझे उस कलिंदी तट का अंश बना दो, जहाँ तुम्हारे प्रेम की लहरें मृदुल स्पर्श करती हैं और तुम्हारी मधुर मुरली की तान गूँजती है। [2]
जिस कदंब की डाल पर आप अपना हाथ रखकर खड़े होते हैं, मुझे उसी कदंब का वृक्ष बना दीजिए। [3]
और हे ब्रजराज! मुझे ऐसा बना दो कि कभी तुम्हारे चरण-कमल मुझे स्पर्श करें—क्यों न मुझे ब्रज की रज बना दो। [4]

