कोऊ नेष्ठा नाम की, कोऊ नामी नेम।
कोऊ रस बस रसिक के, कोऊ लाड़े प्रेम॥
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (375)
श्री बिहारिन देव जी कहते हैं कि कोई-कोई बिना स्वरूप, सुख और सम्बन्ध का विचार किए केवल नाम-जप में ही निष्ठा रखता है; किसी की निष्ठा नामी के ध्यान में होती है। कोई श्री लाल जू (श्रीकृष्ण) के ही रस में निरंतर लीन रहता है। परन्तु कोई-कोई अति अद्भुत, बड़भागी विरले महात्मा ऐसे भी होते हैं जो श्री बिहारी-बिहारिनि जू के नित्य-विहार-रस को ही सदा लाड़-लड़ाते रहते हैं।

