(कवित्त)
वेदन कौ सार, सार सबही पुरानन को,
रसहू कौ सार निरधार कर राख्यौ है। [1]
भूतल रसातल औ लोक ब्रजमंडल कौ,
सबही कौ सार एक वृन्दावन भाख्यौ है॥ [2]
जिनहूँ कौ सार नव निकुंज-बिहार नित,
सो तो समूह सुख ललितादिक चाख्यौ है। [3]
तिनहूँ कौ सार आली श्रीगुरु सिखायौ जिन,
"प्रेमसखी" राधा-महामंत्र उर नाख्यौ है॥ [4]
- श्री प्रेमदासजी [श्री लाल बलबीर जी के भ्राता]
समस्त वेदों का सार, समस्त पुराणों का सार, रस का वास्तविक और अंतिम रूप यही है। [1]
वेदन कौ सार, सार सबही पुरानन को,
रसहू कौ सार निरधार कर राख्यौ है। [1]
भूतल रसातल औ लोक ब्रजमंडल कौ,
सबही कौ सार एक वृन्दावन भाख्यौ है॥ [2]
जिनहूँ कौ सार नव निकुंज-बिहार नित,
सो तो समूह सुख ललितादिक चाख्यौ है। [3]
तिनहूँ कौ सार आली श्रीगुरु सिखायौ जिन,
"प्रेमसखी" राधा-महामंत्र उर नाख्यौ है॥ [4]
- श्री प्रेमदासजी [श्री लाल बलबीर जी के भ्राता]
समस्त वेदों का सार, समस्त पुराणों का सार, रस का वास्तविक और अंतिम रूप यही है। [1]
भूतल, रसातल और अन्य लोकों का, तथा ब्रज मंडल का भी सार वह श्री वृंदावन धाम ही है, जिसे रसिकों द्वारा वर्णित किया गया है। [2]
जिसका सार नित्य नव निकुंज के विहार रस में निहित है, और जिसमें ललिता समेत अन्य सखियाँ उस रस का केवल पान करती हैं। [3]
श्री प्रेमदास जी कहते हैं: हे सखी, हमारे गुरु द्वारा सिखाया गया वही सार है, जिसे हम नित्य अपने हृदय में "राधा" महामंत्र के रूप में धारण करते हैं (जो सबका सार है)। [4]

![वेदन कौ सार, सार सबही - श्री प्रेमदासजी [श्री लाल बलबीर जी के भ्राता]](https://images.brajrasik.org/5fa95c90cfaceb0007ba48c9-m.jpeg)