न विद्यते च पाताले नान्तरिक्षे न मानुषे - आदि वराह पुराण (153.48)

न विद्यते च पाताले नान्तरिक्षे न मानुषे - आदि वराह पुराण (153.48)

न विद्यते च पाताले नान्तरिक्षे न मानुषे ।।
समानं मथुराया हि प्रियं मम वसुन्धरे ।।

- आदि वराह पुराण (153.48)

श्री कृष्ण कहते हैं : हे वसुंधरा, इस लोक में, पाताल में, एवं अंतरिक्ष में या कहीं पर भी मुझे ब्रज मंडल से अधिक प्रिय स्थल कुछ भी नहीं है ।