(राग विहागरौ)
मेरी लाडिली राजत रंग भरी ।
अधिक प्यार सौ मृदु भुज प्यारी, हँसि पिय - अंस धरी ।। [1]
चित्र से ह्वै रहे नागर नागरी, कौंन भाग ते इहि रस ढरी ।
' हित ध्रुव ' अवधि प्यार की दोउ, लगी अँखियाँ शुभ घरी ।। [2]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (89)
श्री हित ध्रुवदास जी कहते है कि मेरी आराध्या लाड़िली-किशोरी सदैव आनंद से परि-पुरित ही रही आती हैं । जब कभी वे अत्यधिक प्रेम से भर कर अपनी सुकोमल भूजलता को प्रियतम के स्कन्द पर प्रसन्नता पूर्वक रख देती है ।। [1]
तब तो परम चतुर प्रियतम चित्र की भाँति जाड्य-भाव को प्राप्त हो जाते है । वे सोचने लगते है कि- अहो ! आज मेरा कौन सा भाग्य उदय हुआ, जो नागरी प्रिय ऐसे रस में ढल गयी । पुनः श्री हित ध्रुवदास जी कहते है हमारे परमाराध्य युगल श्री लाड़िली-लाल प्रेम की पराकाष्ठा है । यह हमारा सौभाग्य है कि जिस किसी शुभ-घड़ी में हमारे नेत्र इनसे लग गए ।। [2]
मेरी लाडिली राजत रंग भरी ।
अधिक प्यार सौ मृदु भुज प्यारी, हँसि पिय - अंस धरी ।। [1]
चित्र से ह्वै रहे नागर नागरी, कौंन भाग ते इहि रस ढरी ।
' हित ध्रुव ' अवधि प्यार की दोउ, लगी अँखियाँ शुभ घरी ।। [2]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (89)
श्री हित ध्रुवदास जी कहते है कि मेरी आराध्या लाड़िली-किशोरी सदैव आनंद से परि-पुरित ही रही आती हैं । जब कभी वे अत्यधिक प्रेम से भर कर अपनी सुकोमल भूजलता को प्रियतम के स्कन्द पर प्रसन्नता पूर्वक रख देती है ।। [1]
तब तो परम चतुर प्रियतम चित्र की भाँति जाड्य-भाव को प्राप्त हो जाते है । वे सोचने लगते है कि- अहो ! आज मेरा कौन सा भाग्य उदय हुआ, जो नागरी प्रिय ऐसे रस में ढल गयी । पुनः श्री हित ध्रुवदास जी कहते है हमारे परमाराध्य युगल श्री लाड़िली-लाल प्रेम की पराकाष्ठा है । यह हमारा सौभाग्य है कि जिस किसी शुभ-घड़ी में हमारे नेत्र इनसे लग गए ।। [2]

