जितनी वह दूर रहें हम सों - ब्रज के दोहे

जितनी वह दूर रहें हम सों - ब्रज के दोहे

जितनी वह दूर रहें हम सों, उतनी हम उनकी चाह करें।
सुख अद्भुत प्रेम की पीड़ में है, हम आह करें वो वाह करें॥
- ब्रज के दोहे

 मेरे प्रियतम श्यामसुंदर चाहे मुझसे जितने भी उदासीन रहें, मैं उनसे उतना ही अधिक प्रेम करता जाऊं। विरह की वेदना में एक अद्भुत और अलौकिक सुख छिपा है। कितना अच्छा हो कि जब भी मैं आहें भरूं, मेरी वेदना उन्हें इतनी प्रिय लगे कि वे प्रसन्न होकर "वाह" कह उठें।