कुंजन तै उठी प्राप्त, गात जमुना मै धोवै ।
निधिवन करि दंडौत, बिहारी को मुख जोवै ।। [1]
करै भावना बैठि, सच्छ थल रहित उपाधा ।
घर घर लेइ प्रसार, लगै जब भोजन स्वाधा ।। [2]
संग करै भगवत रसिक, कर करुवा, गूदर गरै ।
वृन्दावन बिहरत फिरै, जुगल रूप नैननि भरै ।। [3]
- श्री भगवत रसिक, श्री भगवत रसिक जी की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उतरार्द्ध] (37)
करै भावना बैठि, सच्छ थल रहित उपाधा ।
घर घर लेइ प्रसार, लगै जब भोजन स्वाधा ।। [2]
संग करै भगवत रसिक, कर करुवा, गूदर गरै ।
वृन्दावन बिहरत फिरै, जुगल रूप नैननि भरै ।। [3]
- श्री भगवत रसिक, श्री भगवत रसिक जी की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उतरार्द्ध] (37)
साधक को चाहिए की वह सबेरे(अपेन विश्राम) कुंज से उठकर सबसे पहले श्री यमुना जी में स्नान करे, फिर निधिवन को प्रणाम करता हुआ श्री बांकेबिहारी जी महाराज के दर्शन करे । [1]
इसके बाद किसी उपाधि रहित (शांत एकांत) शुद्ध स्वच्छ, स्थान पर बैठकर श्री युगल की रसमयी लीलाओ की भावना करे । तत्पश्चात जब (भूख अधिक सताये) भोजन करने की स्वतः प्रवृति हो, तब घर घर माँग (मधुकरी वृति से ) प्रसाद ग्रहण करे । [2]
(अन्य सब लोगो का संग त्याग कर ) केवल श्री हरि के रसिक भक्तो को ही सत्संग करे । इस प्रकार हाथ में करवा लेकर, गले में गुदड़ी लपेट कर और श्री युगल की रूप माधुरी से नयनो को भरकर श्री वृन्दावन में विचरण करता रहे । [3]

![कुंजन तै उठी प्राप्त - श्री भगवत रसिक, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उतरार्द्ध] (37)](https://images.brajrasik.org/5fac16ac847dfe00083d038e-m.jpeg)