जब प्रिया मानैं अपनपौ, तब लाल रहें आधीन।
मन इच्छित सुख कौं लहे, छिन छिन प्रीति नवीन॥
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत की साखी (152)
जिसे श्री नित्य-विहारिणी जू (श्री राधा) अपना स्वीकार कर लेती हैं, श्री लाल जू (श्री कृष्ण) सदैव उसी के अधीन रहते हैं। वह जीव निरंतर सुखपूर्वक विहार करता हुआ, प्रतिक्षण श्री युगल से नित्य-नूतन प्रीति करता रहता है।

