बसिके वृन्दाविपिन में, ऐसी मन में राख।
प्राण तजौ बन ना तजौ, कहौ बात कोऊ लाख॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (67)
श्री वृन्दावन में वास करते हुए यह धारणा मन में दृढ़ कर लो कि चाहे कोई लाख प्रलोभन दे, मैं प्राण तो त्याग दूँगा, पर श्री वृन्दावन को कभी नहीं त्यागूँगा।
प्राण तजौ बन ना तजौ, कहौ बात कोऊ लाख॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (67)
श्री वृन्दावन में वास करते हुए यह धारणा मन में दृढ़ कर लो कि चाहे कोई लाख प्रलोभन दे, मैं प्राण तो त्याग दूँगा, पर श्री वृन्दावन को कभी नहीं त्यागूँगा।

