(कवित्त)
अधर लगाय रस प्याय बाँसुरी बजाय,
मेरा नाम गाय हाथ जादू कियो मन में। [1]
नटवर नवल सुघर नँदनंदन ने,
करिके अचेत चेत हरि के जनत में॥ [2]
झटपट उलट-पुलट हट परिधान,
जान लागो लालन पै सबै बाम बन में। [3]
रस रास सरस रँगीले रसखानि आनि,
जानि जोर जुगुति बिलास किए जन में॥ [4]
- श्री रसखान, रसखान रत्नावली
अपने होठों से लगाकर उन्होंने ऐसा मधुर रस पिला दिया, जब अपनी प्रिय बाँसुरी को बजाया। मेरा नाम भी बाँसुरी के सुरों में गूँजाया, हाय! जैसे उन्होंने मुझ पर जादू सा कर दिया। [1]
वह सुंदर, मनमोहन, नटखट नटवर नागर, गिरधर, ने घर में बैठे बैठे ही अपने अलौकिक आकर्षण से मुझे अचेत कर गए। [2]
अपनी अस्त-व्यस्त वस्त्रों को सँभालते हुए, सभी गोपियाँ उनके पीछे वन की ओर जाने लगीं। [3]
हे रसखान! उस रँगीले मोहन ने महारास रचाकर सबके ह्रदय में अपनी अमिट छवि बसा दी है। [4]
अधर लगाय रस प्याय बाँसुरी बजाय,
मेरा नाम गाय हाथ जादू कियो मन में। [1]
नटवर नवल सुघर नँदनंदन ने,
करिके अचेत चेत हरि के जनत में॥ [2]
झटपट उलट-पुलट हट परिधान,
जान लागो लालन पै सबै बाम बन में। [3]
रस रास सरस रँगीले रसखानि आनि,
जानि जोर जुगुति बिलास किए जन में॥ [4]
- श्री रसखान, रसखान रत्नावली
अपने होठों से लगाकर उन्होंने ऐसा मधुर रस पिला दिया, जब अपनी प्रिय बाँसुरी को बजाया। मेरा नाम भी बाँसुरी के सुरों में गूँजाया, हाय! जैसे उन्होंने मुझ पर जादू सा कर दिया। [1]
वह सुंदर, मनमोहन, नटखट नटवर नागर, गिरधर, ने घर में बैठे बैठे ही अपने अलौकिक आकर्षण से मुझे अचेत कर गए। [2]
अपनी अस्त-व्यस्त वस्त्रों को सँभालते हुए, सभी गोपियाँ उनके पीछे वन की ओर जाने लगीं। [3]
हे रसखान! उस रँगीले मोहन ने महारास रचाकर सबके ह्रदय में अपनी अमिट छवि बसा दी है। [4]

