(कवित्त)
तेरे नैंन मेरे नैंन मेरे नैंन तेरे नैंन,
और ठौर चलिबे क़ौं दीठ कैं न पग हैं। [1]
तेरी प्रीति मेरी प्रीति मेरी प्रीति तेरी प्रीति,
प्रीति की प्रतीति दोऊ और बैठी लग हैं॥ [2]
तेरे प्रान मेरे प्रान मेरे प्रान तेरे प्रान
‘नागरिया’ एक प्रान जानैं सब जग है। [3]
तेरौ मन मेरौ मन मेरौ मन तेरौ मन
मेरो मन ठगिबे कौ तेरो मन ठग है॥ [4]
- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक कवित्त (23)
श्री राधारानी श्री कृष्ण से कहती हैं: तेरे नैंन मेरे नैंन हैं, और मेरे नैंन तेरे नैंन हैं, किसी और ठौर [जगह] हम दोनों के नैंन भूलकर भी नहीं जाते। [1]
तेरे नैंन मेरे नैंन मेरे नैंन तेरे नैंन,
और ठौर चलिबे क़ौं दीठ कैं न पग हैं। [1]
तेरी प्रीति मेरी प्रीति मेरी प्रीति तेरी प्रीति,
प्रीति की प्रतीति दोऊ और बैठी लग हैं॥ [2]
तेरे प्रान मेरे प्रान मेरे प्रान तेरे प्रान
‘नागरिया’ एक प्रान जानैं सब जग है। [3]
तेरौ मन मेरौ मन मेरौ मन तेरौ मन
मेरो मन ठगिबे कौ तेरो मन ठग है॥ [4]
- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक कवित्त (23)
श्री राधारानी श्री कृष्ण से कहती हैं: तेरे नैंन मेरे नैंन हैं, और मेरे नैंन तेरे नैंन हैं, किसी और ठौर [जगह] हम दोनों के नैंन भूलकर भी नहीं जाते। [1]
तेरी प्रीति मेरी प्रीति और मेरी प्रीति तेरी प्रीति, हम दोनों इस प्रीति की प्रतीति में अचल एवं गतिहीन बैठे हैं। [2]
तेरे प्राण मेरे प्राण हैं, और मेरे प्राण तेरे प्राण हैं, श्री नागरी [राधा] कहती हैं कि सारा जग जानता है कि हम दोनों का प्राण एक ही है। [3]
तेरा मन मेरा मन है, मेरा मन तेरा मन है, मेरा मन ठगने के लिए तेरा मन एक ठग [लुटेरे] की तरह है। [4]

