सान्द्र प्रेम-रसौघ-वर्षिणि नवोन्मीलन्महामाधुरी,
साम्राज्यैक-धुरीण केलि-विभवत्कारूण्य कल्लोलिनि।
श्रीवृन्दावनचन्द्र-चित्त-हरिणी-बन्धु स्फुरद्वागुरे,
श्रीराधे नव-कुञ्ज-नागरि तव क्रीतास्मि दास्योत्सवै: ।।
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (206)
हे घनीभूत प्रेम रस-प्रवाह-वर्षिणी ! हे नवीन विकसित महामाधुरी साम्राज्य की सर्व-श्रेष्ठ केलि-विभव - युक्त करुणा - कल्लोलिनि ! (सांरते !) हे श्रीवृन्दावन-चन्द्र के चित्त रूप मृगी-बन्धु (हरिन) के लिये प्रकाशमान् बन्धन-रूपे ! हे नवकुञ्ज-नागरि ! हे श्रीराधे ! मैं आपके दास्योत्साव में बिक चुकी हूँ।
साम्राज्यैक-धुरीण केलि-विभवत्कारूण्य कल्लोलिनि।
श्रीवृन्दावनचन्द्र-चित्त-हरिणी-बन्धु स्फुरद्वागुरे,
श्रीराधे नव-कुञ्ज-नागरि तव क्रीतास्मि दास्योत्सवै: ।।
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (206)
हे घनीभूत प्रेम रस-प्रवाह-वर्षिणी ! हे नवीन विकसित महामाधुरी साम्राज्य की सर्व-श्रेष्ठ केलि-विभव - युक्त करुणा - कल्लोलिनि ! (सांरते !) हे श्रीवृन्दावन-चन्द्र के चित्त रूप मृगी-बन्धु (हरिन) के लिये प्रकाशमान् बन्धन-रूपे ! हे नवकुञ्ज-नागरि ! हे श्रीराधे ! मैं आपके दास्योत्साव में बिक चुकी हूँ।

