आपनि दसा कहा अब कहिये - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (292)

आपनि दसा कहा अब कहिये - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (292)

आपनि दसा कहा अब कहिये ।
तुम कौं सब ही उचित कृपानिधि, मोकौं ऐसी न चाहिये ।। [1]
कब लगि विषयन में मन देकैं, चरण कमल बिसरैये ।
कब लगि दासी कहत कहावत, सब जग नाम धरैये ।। [2]
कब लगि बान रावरी समुझत, हिय कठोरता गहिये ।
कब लगि यह न फटैगी छाती, सोच-सोच पछितैये ।। [3]
यह विनती अब करत कृपानिधि, ऐसी रहन मिटैये ।
गाढ़ी प्रीति हिये में दीजै, ज्यौ पद पंकज लहिये ।। [4]

- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (292)

हे प्यारी जू ! मैं अपनी दयनीय दशा के विषय में अब आपसे क्या कहूँ ? हे कृपानिधि ! आप जो कुछ भी करती हो , उसे करना तो आपके लिए उचित ही है; किन्तु मैं जो कर रही हूँ, वह मेरे लिए पूरी तरह से अनुचित है । [1] 

मैं कब तक आपके चरण-कमलो से गाढ़ी प्रीति न करके, अपने मन को विषय-वासनाओ से ग्रसित बनाये रखूँगी ? मैं कब तक अपने आपको आपकी दासी कहते हुए तथा कहलाते हुए , इस संसार में इस नाम को बदनाम कराती रहूँगी ? [2] 

आप कब तक दूसरो पर सहज रूप से कृपा करने के अपने स्वाभाव को जानते-समझते हुए, मेरे प्रति अपने हृदय को कठोर बनाये रखोगी ? मेरी ये छाती कब तक नहीं फटेगी और मैं ये सब सोचते हुए केवल पश्चाताप मात्र ही करती रहूँगी ? [3]

श्रीहित भोरी सखी जी निवेदन करती है कि हे कृपानिधि ! अब तो मैं आपसे विनम्र प्रार्थना करती हूँ की आप मेरी इस रहनी - सहनी से मुझे मुक्ति दिलाकर, मेरे ह्रदय में आपके प्रति गहरी प्रीति उत्पन्न कर दो, जिससे की मुझे आपके चरण - कमलो का आश्रय प्राप्त हो जाय । [4]