(दोहा)
ढारौं निज कर चँवर लै, धारौं नैननि नेह।
सोवत जुगल किसोर जहँ, सेऊँ चरन सुदेह॥
(राग विहागरौ, इक ताल)
(पद)
सोवत जुगल किशोर चँवर हौ ढारौ।
कबहुँक सेऊँ चरन नैननि में, नौतन नेह सुधा रस धारौं॥ [1]
कबहुँक पद पल्लव राधे के, अपने नैन कनीन निसारौं।
कबहुँक श्रीभट नंदलाल के, कोमल चरन कमल पुचकारौं॥ [2]
- श्री भट्ट देवाचार्य, श्री युगल शतक (52)
(दोहा)
यह निकुंज-सेवा की अद्भुत झाँकी है। श्रीयुगलकिशोर दम्पति विश्राम कर रहे हों [सो रहे हों], प्रेम-सुधा रस का पान इन नैनन से करती हुई, नेह-युक्त सुंदर युगल-चरणों [का सेवन करती हुई] की चँवर-सेवा करूँ।
(पद)
श्री युगल किशोर सो रहे हों, और मैं उनकी चँवर सेवा करूँ। कभी उन युगल चरणों को प्रेम से नैनों से लगाकर सेवा करूँ, पुनः इन नैनों से नवीन नित्य सुधा रस धारण करती हुई सेवा करूँ। [1]
कभी श्री राधिका के चरण कमल को अपने नैनों की पुतली से भी निकट लगा कर सेवन कर स्वयं को उन गोरे चरणों पर बलिहार जाऊँ और कभी कभी उन नंद्लाल के कोमल चरणों को प्रेम से दुलराऊँ। [2]
ढारौं निज कर चँवर लै, धारौं नैननि नेह।
सोवत जुगल किसोर जहँ, सेऊँ चरन सुदेह॥
(राग विहागरौ, इक ताल)
(पद)
सोवत जुगल किशोर चँवर हौ ढारौ।
कबहुँक सेऊँ चरन नैननि में, नौतन नेह सुधा रस धारौं॥ [1]
कबहुँक पद पल्लव राधे के, अपने नैन कनीन निसारौं।
कबहुँक श्रीभट नंदलाल के, कोमल चरन कमल पुचकारौं॥ [2]
- श्री भट्ट देवाचार्य, श्री युगल शतक (52)
(दोहा)
यह निकुंज-सेवा की अद्भुत झाँकी है। श्रीयुगलकिशोर दम्पति विश्राम कर रहे हों [सो रहे हों], प्रेम-सुधा रस का पान इन नैनन से करती हुई, नेह-युक्त सुंदर युगल-चरणों [का सेवन करती हुई] की चँवर-सेवा करूँ।
(पद)
श्री युगल किशोर सो रहे हों, और मैं उनकी चँवर सेवा करूँ। कभी उन युगल चरणों को प्रेम से नैनों से लगाकर सेवा करूँ, पुनः इन नैनों से नवीन नित्य सुधा रस धारण करती हुई सेवा करूँ। [1]
कभी श्री राधिका के चरण कमल को अपने नैनों की पुतली से भी निकट लगा कर सेवन कर स्वयं को उन गोरे चरणों पर बलिहार जाऊँ और कभी कभी उन नंद्लाल के कोमल चरणों को प्रेम से दुलराऊँ। [2]

