यह रस दुर्लभ हूँ ते दुर्लभ, सुलभ नित्य रहत है ताहि।
श्रीहरिप्रिया जान जन जिये में, हिये में अपनावत जब जाहि॥
- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सिद्धांत सुख (5.22)
यह रस अत्यन्त दुर्लभ है। यह केवल उन्हीं को सुलभ होता है, जिन पर श्रीहरि की प्रिया अर्थात् श्रीस्वामिनी जी की कृपा होती है।

